Friday, December 26, 2025

क्या ईश्वर का अस्तित्व है?

“ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं” विषय पर हुआ यह बहुचर्चित डिबेट सोशल मीडिया पर इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे मुफ़्ती ने इसे पूरी तरह जीत लिया हो। लेकिन सच्चाई यह है कि इस बहस में कोई भी निर्णायक रूप से नहीं जीता। हाँ, जो चीज़ ज़रूर जीती, वह था एक सुनियोजित और गढ़ा हुआ नैरेटिव।
यह डिबेट वायन फ़ाउंडेशन द्वारा आयोजित की गई थी, जो खुद मुफ़्ती की ही संस्था है। दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम विद्वानों का था, जो हर बार मुफ़्ती द्वारा किसी तथाकथित वैज्ञानिक शब्द का प्रयोग करने पर ज़ोरदार तालियाँ बजा रहे थे—भले ही उन शब्दों के पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक व्याख्या या प्रमाण मौजूद न हो। इससे यह भ्रम पैदा हुआ कि मुफ़्ती तार्किक रूप से भारी पड़ रहे हैं।
डिबेट के बाद चुनिंदा क्लिप्स को चतुराई से काट-छाँट कर सोशल मीडिया, खासकर यूट्यूब पर वायरल किया गया। कमेंट सेक्शन में बड़ी संख्या में मुस्लिम या संदिग्ध प्रोफाइल्स दिखाई देती हैं जो मुफ़्ती के पक्ष में लिख रही हैं, साथ ही कुछ तथाकथित गैर-मुस्लिम नामों से यह कहा जा रहा है कि वे इस बहस के बाद इस्लाम कबूल कर रहे हैं। यह बात हास्यास्पद लगती है, क्योंकि पूरी बहस में ऐसा कोई ठोस या मौलिक तर्क सामने नहीं आया जो किसी को धर्म परिवर्तन के लिए विवश कर सके।
असल में, वायन फ़ाउंडेशन द्वारा चलाए गए इस प्रचार अभियान ने बहस के मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर दिया। खुले और ईमानदार संवाद की जगह, बहस को एक हीरो बनाने की प्रक्रिया में बदल दिया गया। अब यूट्यूब पर मुफ़्ती और उनकी संस्था के सदस्य बहस के तथाकथित ‘विश्लेषण’ वीडियो डालकर यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मुफ़्ती ने शानदार जीत हासिल की—जबकि ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
दूसरी ओर, जावेद साहब लगभग अकेले खड़े होकर दार्शनिक दृष्टिकोण से बहस करते रहे। उन्होंने शांत और तार्किक ढंग से कई सवाल उठाए, जिनमें से कुछ बेहद सरल थे, लेकिन मुफ़्ती उन सवालों के सीधे और स्पष्ट उत्तर देने में असफल रहे। इसके बावजूद, शोर और प्रचार ने तथ्य और तर्क को पीछे छोड़ दिया।
मैं सभी लोगों से अपील करता हूँ कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले पूरी बहस देखें। साथ ही आयोजकों से यह भी अनुरोध है कि भविष्य में ऐसी बहसें किसी निष्पक्ष मंच द्वारा आयोजित की जाएँ। आयोजक या प्रायोजक स्वयं बहस का हिस्सा न हों। और यदि विज्ञान का बार-बार उल्लेख किया जाता है, तो किसी योग्य वैज्ञानिक को भी बहस में शामिल किया जाना चाहिए।
बहस का उद्देश्य सत्य की खोज होना चाहिए—न कि वायरल क्लिप्स, तालियों का नाटक या सोशल मीडिया प्रचार।


अब बहस में उठाए गए दोनों पक्षों के तर्कों की बात करते हैं। अपनी बात साबित करने के लिए मुफ़्ती तीन शब्दों का सहारा ले रहे थे—पहला मेटाफ़िज़िकल, दूसरा कॉन्टिन्जेन्सी और तीसरा इनफ़िनिट रिग्रेशन

अब किसी चीज़ को बस “मेटाफ़िज़िकल” कह देना अपने आप में एक लॉजिकल फ़ैलेसी है, क्योंकि इससे आप उसके प्रमाण देने की ज़िम्मेदारी से बच जाते हैं। आपने कह दिया कि यह मेटाफ़िज़िकल है, अब लोग इसे मान लें क्योंकि भौतिक जगत में इसका कोई प्रमाण हो ही नहीं सकता। इसके बाद यह बात आस्था और विश्वास पर आकर टिक जाती है, जबकि ख़ुद मुफ़्ती कह रहे थे कि वे वैज्ञानिक बात करेंगे।

दूसरा तर्क यह दिया गया कि संसार की सारी चीज़ें कॉन्टिन्जेंट हैं, यानी हर वस्तु किसी न किसी के द्वारा बनाई गई है, इसलिए इस दुनिया को बनाने वाला भी कोई होगा। पहली बात तो यह कि कॉन्टिन्जेन्सी कोई स्थापित सिद्धांत नहीं है और इस पर आज भी बहस जारी है। इसके बावजूद मुफ़्ती ने इसे मान लिया। ऐसे में यह भी विश्वास की ही बात हो जाती है, क्योंकि मुफ़्ती कहते हैं कि सारी चीज़ें कॉन्टिन्जेंट हैं, लेकिन ईश्वर कॉन्टिन्जेंट नहीं है। इस तरह मुफ़्ती साहब अपनी ही बात को ख़ुद काट देते हैं।

तीसरी बात यह है कि एक तरफ़ तो मुफ़्ती साहब कॉन्टिन्जेन्सी थ्योरी को मान लेते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इनफ़िनिट रिग्रेशन को लॉजिकल फ़ैलेसी बता देते हैं, जबकि कॉन्टिन्जेन्सी को मानने और इनफ़िनिट रिग्रेशन को न मानने का कोई ठोस और जायज़ तर्क वे नहीं दे पाते।

इस तरह मुफ़्ती के सारे तर्क अंत में एक ही बात पर टिके हुए नज़र आते हैं—कि आप मान लो, क्योंकि मैं ऐसा कह रहा हूँ। जबकि बहस की शुरुआत में मुफ़्ती ने कहा था कि वे वैज्ञानिक तरीक़े से यह सिद्ध करने की कोशिश करेंगे कि ईश्वर है या नहीं।

अरे मुफ़्ती साहब, विज्ञान को आप समझते ही नहीं हैं। विज्ञान इस आधार पर काम नहीं करता कि मैं मानता हूँ या नहीं मानता। विज्ञान प्रमाणों पर काम करता है। अगर न्यूटन बिना किसी प्रमाण के यह कह देते कि मेरे तीन नियम हैं और आप उन्हें मान लो, तो क्या दुनिया उन्हें मान लेती? न्यूटन ने अपने नियमों को वैज्ञानिक तरीक़े से सिद्ध करके दिखाया, दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने अलग-अलग कसौटियों पर उन्हें परखा, तब जाकर यह स्थापित हुआ कि हाँ, ये नियम सही हैं।

सिर्फ़ लॉजिकल फ़ैलेसी और दो-चार वैज्ञानिक शब्द बोल देने से कोई बात प्रमाणित नहीं हो जाती।

अब बात करते हैं जावेद साहब द्वारा दिए गए तर्कों और उन पर मुफ़्ती के जवाबों की। पहली बात, जावेद साहब ने कहा कि प्रकृति में कोई इंसाफ़ नहीं होता, इंसाफ़ दरअसल इंसानों द्वारा बनाया गया एक कॉन्सेप्ट है। इस पर मुफ़्ती का कहना था कि इंसाफ़ भगवान करता है। यहाँ मैं जावेद साहब की बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि प्रकृति में कोई इंसाफ़ नहीं होता।

प्रकृति में सिर्फ़ फ़ूड चेन होती है—ताक़तवर जानवर कमज़ोर का शिकार करके खा जाता है, बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। प्राकृतिक आपदाओं में भी प्रकृति कोई इंसाफ़ नहीं देखती। जब सुनामी, भूकंप या बाढ़ आती है, तो उसमें न इंसान देखा जाता है न जानवर—सब मारे जाते हैं। यह तो विज्ञान है जो आजकल पहले से प्राकृतिक आपदाओं का अनुमान लगा लेता है और आपदा आने पर बचाव के साधन उपलब्ध कराता है।

दूसरा बुनियादी तर्क जावेद साहब ने यह दिया कि अगर भगवान इतना ही दयालु है और अपने बच्चों का ख़याल रखता है, तो ग़ज़ा में 45,000 बच्चे क्यों मारे गए? इस पर मुफ़्ती साहब का तर्क था कि भगवान “इम्तिहान” ले रहा है, और इस बात को साबित करने के लिए उन्होंने एग्ज़ाम और एग्ज़ामिनर का उदाहरण दिया।

पहली बात, यह कैसा इम्तिहान है? भगवान किस बात का टेस्ट ले रहा है? दूसरी बात, इस टेस्ट में पास होने पर उन बच्चों को इनाम मिलेगा—मतलब यह कैसा बेहूदा तर्क है कि भगवान बच्चों का इम्तिहान ले रहा है और बदले में उन्हें इनाम देगा, जिसका कोई सबूत या साक्ष्य मुफ़्ती साहब के पास नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि लोग उनकी बात मान लें।

ख़ैर, इस मुद्दे पर मुफ़्ती ने काफ़ी ज़ोर दिया और इम्तिहान व इग्ज़ामिनर की बात कही। तो साफ़ कह दूँ कि यह पूरा तर्क ही मुफ़्ती साहब की ज़ुबान में एक लॉजिकल फ़ैलेसी है। क्योंकि पहली बात, इम्तिहान का स्तर अलग-अलग कक्षाओं और उम्र के हिसाब से होता है। दूसरी बात, इम्तिहान लेने से पहले परीक्षक बच्चों को पूरा सिलेबस बता देता है कि इसी में से प्रश्न आएँगे। साथ ही यह भी बताया जाता है कि पास होने का मानदंड क्या होगा, पास होने पर क्या मिलेगा और फेल होने पर क्या होगा—सब कुछ पहले से स्पष्ट होता है।

लेकिन ग़ज़ा में, या इस दुनिया के उन तमाम इलाक़ों में जहाँ ज़ुल्म हो रहा है, वहाँ कैसा इम्तिहान चल रहा है? न किसी को यह पता है कि यह क्यों चल रहा है, न यह कि पास या फेल होने का मापदंड क्या है, और न यह कि पास होने पर क्या मिलेगा। मतलब यह कैसा इम्तिहान है और कैसा इग्ज़ामिनर है आपका, जो सीधे मार ही दे रहा है?

इस थ्योरी से मुझे पुराने ज़माने की ग्लैडिएटर लड़ाइयाँ याद आ गईं, जहाँ राजा ग़ुलामों को तब तक लड़वाते थे जब तक कोई एक मर न जाए। शायद भगवान भी अपने मनोरंजन के लिए कुछ ऐसा ही खेल खेल रहा है। जबकि इंसानों ने जैसे-जैसे सभ्यता का विकास किया, ऐसे खेल बंद कर दिए, या कह लें कि ग़ुलामों ने विद्रोह कर दिया और एक ज़्यादा सभ्य समाज की स्थापना की। इस तर्क के अनुसार तो भगवान एक बेहद बर्बर खेल खेल रहा है, और लोगों को उसके ख़िलाफ़ विद्रोह कर देना चाहिए।

तीसरी बात जावेद साहब के तर्क की थी एग्ज़िस्टेंस ऑफ़ ईविल पर। इस पर मुफ़्ती का कहना था कि बुराई फ़्री विल की वजह से है, और फ़्री विल भगवान की दी हुई है। अब जब जावेद साहब कहते हैं कि अगर किसी की फ़्री विल से कोई मुझे मार दे, तो उसका ज़िम्मेदार भगवान होगा या नहीं—तो इस सवाल पर मुफ़्ती साहब बचते नज़र आते हैं।

अरे, जब फ़्री विल भगवान ने दी है, तो फ़्री विल से किए गए क़त्ल का ज़िम्मेदार भी भगवान ही होगा न। अगर भगवान चाहता, तो उस व्यक्ति की फ़्री विल को नियंत्रित करके क़त्ल रोक सकता था। लेकिन यहाँ भी मुफ़्ती साहब कोई ठोस या जायज़ तर्क देने के बजाय बस यही कहते नज़र आते हैं—“मेरी बात मान लो।”

अब आते हैं आख़िरी बात पर, जिसकी क्लिप्स सोशल मीडिया पर वायरल करके यह कहा गया कि मुफ़्ती बहस जीत गए। यह बात जावेद साहब ने मेज़ॉरिटी यानी बहुमत को लेकर कही थी। जावेद साहब का कहना था कि क्या सही है और क्या ग़लत, यह बहुमत तय करेगा। इसी बात को पकड़कर मुफ़्ती साहब ने कहा कि जब बहुमत भगवान को मानता है तो आप क्यों नहीं मानते।

हालाँकि इसके बाद बहस ख़त्म कर दी गई। हो सकता है कि एक साहित्यकार और कवि इस बात का तुरंत सही जवाब न दे पाए हों, इसलिए मैं इसका जवाब दे देता हूँ। दुनिया में अगर बहुमत ईसाई धर्म को मानता है, तो यदि मुफ़्ती साहब के बहुमत वाले तर्क को मान लिया जाए, तो सबको ईसाई धर्म अपना लेना चाहिए। लेकिन यह तो सभी जानते हैं कि मुफ़्ती साहब ख़ुद बहुमत से सहमत होने वाली बात नहीं मानते।

दूसरी बात, जावेद साहब का यह तर्क भी ग़लत है कि बहुमत ही सही-ग़लत तय करेगा। इतिहास गवाह है कि दुनिया में बहुमत की वजह से ही सदियों तक ग़ुलामी चली, सदियों तक राजशाही रही, चर्च की सत्ता चली और ईस्ट इंडिया कंपनी का राज रहा। हिटलर और मुसोलिनी जैसे लोग भी बहुमत के सहारे सत्ता में आए।

लेकिन अगर गौर करें तो पाएँगे कि ये सारी व्यवस्थाएँ एक दिन ख़त्म हो गईं। बहुमत की राय ग़लत साबित हुई और जो लोग उस समय अल्पसंख्यक थे, वही बाद में बहुमत में आ गए, और पुरानी व्यवस्थाएँ ध्वस्त हो गईं। यही बात धर्म पर भी लागू होती है। आप देखेंगे कि यूरोप के कई देशों में 40 से 70 प्रतिशत लोग नास्तिक हो चुके हैं और उन देशों में खुशहाली कई अन्य देशों से ज़्यादा है।

इसलिए जावेद साहब की यह बात अहम है कि पहले भगवान या धर्म के ख़िलाफ़ बोलने पर लोगों को सीधे मौत के घाट उतार दिया जाता था, लेकिन आज हम यहाँ तक पहुँच गए हैं कि इस मुद्दे पर बहस तो हो रही है। और जिस विज्ञान के ख़िलाफ़ धर्म हमेशा रहा, आज उसी विज्ञान को मानने पर मजबूर हो गया है। अब वह यह कहने लगा है कि हम विज्ञान के ख़िलाफ़ नहीं हैं, बल्कि भगवान के अस्तित्व को साबित करने के लिए भी विज्ञान की ओर देखने लगा है।

इसलिए लल्लनटॉप या किसी अन्य मंच से गुज़ारिश है कि आगे कभी इस तरह की बहस आयोजित की जाए, तो नास्तिकों का पक्ष रखने के लिए किसी वैज्ञानिक को बुलाया जाए, ताकि मुफ़्ती जैसे लोग दो-चार रटे-रटाए शब्द बोलकर अपनी जीत का दावा करते न दिखाई दें। हालाँकि दर्शक दीर्घा में गौहर रज़ा साहब बैठे हुए थे, लेकिन बहस का फ़ॉर्मेट ऐसा रखा गया था कि सौरभ ने रज़ा साहब को अपनी बात पूरी तरह रखने से भी रोक दिया। (जो लोग गौहर रज़ा को नहीं जानते, वे उनकी किताब “मिथकों से विज्ञान तक” पढ़ सकते हैं, जो अमेज़न पर उपलब्ध है।)

आगे कभी ऐसी बहस हो तो उसे थोड़ा खुले मंच पर किया जाए, जहाँ लोग अपनी बात कुछ आज़ादी के साथ कह सकें। बाकी यह भगवान वाली बहस तो सदियों से चल रही है, उसका फ़ैसला भी वक़्त के साथ ही होगा, एक-दो घंटे की बहस से नहीं। जैसे-जैसे समाज में वैज्ञानिक चेतना बढ़ेगी, सारी चीज़ें अपने आप साफ़ होती चली जाएँगी।

लेकिन यहाँ सबसे बड़ी बात यह है कि धर्म और भगवान की मान्यता के पीछे पूँजीवादी व्यवस्था का भी स्वार्थ छिपा हुआ है। यह व्यवस्था धर्म की आड़ में लोगों के दुख-तकलीफ़ों को ईश्वर के इम्तिहान के नाम पर ढक देती है। प्राकृतिक संसाधनों पर पूँजीपतियों के क़ब्ज़े और मज़दूरों के अथाह शोषण से इकट्ठा की गई संपत्ति को धर्म और भाग्य के नाम पर सही ठहराया जाता है।

अगर भारत का ही उदाहरण लें, तो जहाँ एक तरफ़ देश की लगभग 50 प्रतिशत संपत्ति पर सिर्फ़ 10 प्रतिशत लोगों का क़ब्ज़ा है और बाक़ी 90 प्रतिशत लोग मजबूरी और ग़रीबी में जीवन जीने को विवश हैं, वहीं मुफ़्ती और अन्य धर्मगुरु इसे ईश्वर की मर्ज़ी या ईश्वर का इम्तिहान कहकर सही ठहराने की कोशिश करेंगे।

इसीलिए यह व्यवस्था आए दिन पिछड़े विचारों और मान्यताओं को समाज में स्थापित करने में लगी रहती है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि ऐसी ही कोशिशें गुलामी, राजशाही और चर्च की सत्ता के दौर में भी की गई थीं, और आज वे सारी व्यवस्थाएँ इतिहास बन चुकी हैं।

और जब धर्म को ईश्वर के अस्तित्व से जोड़कर बात की जाती है, तो कार्ल मार्क्स को उद्धृत करना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि धर्म की जितनी सटीक और गहरी व्याख्या उन्होंने की है, वैसी आज तक कोई और नहीं कर पाया। इसलिए मैं अपनी बात यहाँ कार्ल मार्क्स की उस प्रसिद्ध पंक्ति से समाप्त करता हूँ:

"“धर्म-विरोधी आलोचना की बुनियाद यह है कि मनुष्य धर्म को बनाता है, धर्म मनुष्य को नहीं बनाता। वास्तव में धर्म उस मनुष्य की आत्म-चेतना और आत्म-सम्मान है, जिसने या तो अभी तक अपने वास्तविक स्वरूप को पाया नहीं है, या फिर उसे दोबारा खो चुका है। लेकिन मनुष्य कोई अमूर्त सत्ता नहीं है जो दुनिया के बाहर बैठी हो। मनुष्य स्वयं मनुष्य की दुनिया है—राज्य और समाज। यही राज्य और यही समाज धर्म को जन्म देते हैं, और वह धर्म एक ऐसी उलटी चेतना बन जाता है, क्योंकि यह दुनिया स्वयं उल्टे और विकृत सिद्धांतों पर टिकी हुई है।

धार्मिक पीड़ा एक ही समय में वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है और वास्तविक पीड़ा के ख़िलाफ़ एक विरोध भी। धर्म दबे-कुचले प्राणी की आह है, निर्दय दुनिया का हृदय है और निस्सार परिस्थितियों की आत्मा है। यह जनता की अफ़ीम है।

जनता के काल्पनिक सुख के रूप में धर्म का उन्मूलन उनके वास्तविक सुख की माँग है। लोगों से उनकी स्थिति के बारे में उनके भ्रम छोड़ने को कहना, दरअसल उनसे उस स्थिति को छोड़ने को कहना है जिसे इन भ्रमों की ज़रूरत पड़ती है।

इसीलिए धर्म की आलोचना अपने मूल रूप में उस व्यवस्था की आलोचना है, जिसके लिए धर्म एक ढाल की तरह काम करता है। ""


Written By : Prashant Kumar.

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