बचपन से हमें बहुत-सी बातें सिखाई जाती हैं, लेकिन उनमें से कई वास्तविकता से मेल नहीं खातीं। ऐसी ही एक बात यह है कि हम एक ऐसे समाज से आते हैं जहाँ गाली-गलौज को पूरी तरह अस्वीकार्य माना जाता है और हर व्यक्ति से हमेशा शालीन भाषा में बात करने की अपेक्षा की जाती है।
लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
भारत के कई हिस्सों में गाली-गलौज रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुकी है। आप किसी भी गाँव में चले जाइए, वहाँ पुरुष, महिलाएँ और यहाँ तक कि बच्चे भी सामान्य बातचीत में गालियों का सहज इस्तेमाल करते हुए मिल जाएंगे। बनारस जैसे शहर में जाइए, तो लोग आम बातचीत के दौरान बिना किसी झिझक के गाली का प्रयोग कर देते हैं। वहीं दिल्ली-एनसीआर में तो कई बार ऐसा लगता है कि बातचीत तब तक पूरी ही नहीं होती, जब तक उसमें एक-दो गालियाँ न जुड़ जाएँ।
इसी तरह उत्तर प्रदेश के कई इलाकों, विशेषकर अवधी भाषी क्षेत्रों में, "चूतिया" जैसे शब्दों को गाली के रूप में नहीं देखा जाता। इसका प्रयोग केवल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसे मूर्ख या सामान्य समझ-बूझ से वंचित माना जाता है, न कि किसी गहरे अपमान के उद्देश्य से।
यही कारण है कि जब हम अचानक खुद को एक अत्यंत पवित्र, संस्कारी और नैतिक रूप से आदर्श समाज के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं, तो यह मुझे एक गहरी विडंबना लगती है।
तो मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ?
क्योंकि समय-समय पर हमारे "56 इंच का सीना" रखने वाले "विश्वगुरु" राजा साहब अपनी असीम शक्ति, विशाल बहुमत और पूरे सरकारी तंत्र के बावजूद सबसे ज़्यादा आहत कुछ शब्दों से दिखाई देते हैं। शिकायत यही होती है कि लोगों ने उन्हें गालियाँ दीं, अपशब्द कहे, यहाँ तक कि उनकी माँ तक को गाली दी। और फिर पूरी सार्वजनिक बहस जनता के मुद्दों से हटकर केवल शब्दों की अदालत में पहुँच जाती है।
जबकि लोकतांत्रिक देशों में सत्ता के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में व्यंग्य, कटाक्ष, अपमानजनक नारे, कार्टून और यहाँ तक कि गालियों का इस्तेमाल भी लंबे समय से राजनीतिक विरोध का हिस्सा रहा है। हमें वह तरीका व्यक्तिगत रूप से पसंद हो या न हो, लेकिन यह परंपरा दशकों से मौजूद रही है।
इतिहास बार-बार यह दिखाता है कि जब सत्ता स्वयं को दैवीय या पवित्र होने के आवरण में लपेट लेती है, तब श्रद्धा उसकी सबसे बड़ी ढाल बन जाती है—और उपहास उसका सबसे बड़ा ख़तरा।
फ़्रांसीसी क्रांति इसका सबसे प्रभावशाली उदाहरण है। सदियों तक फ़्रांस की राजशाही ने यह धारणा स्थापित की कि राजा ईश्वर की इच्छा से शासन करता है और सामान्य मनुष्यों से ऊपर है। क्रांतिकारियों ने समझ लिया था कि जब तक इस दैवीय छवि को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक सिंहासन भी नहीं गिरेगा।
इसलिए उन्होंने केवल राजशाही के विरुद्ध नहीं, बल्कि उससे जुड़ी उस पवित्र मिथक के विरुद्ध भी अभियान छेड़ दिया। पूरे फ़्रांस में पैम्फलेट, व्यंग्यचित्र (Caricatures) और जानबूझकर अश्लील एवं अपमानजनक चित्र बड़ी संख्या में फैलाए गए। राजा लुई सोलहवें को एक कमजोर, अयोग्य और राष्ट्र का नेतृत्व करने में असमर्थ शासक के रूप में चित्रित किया गया। वहीं रानी मैरी एंटोइनेट को नैतिक रूप से भ्रष्ट, यौन रूप से उच्छृंखल, अत्यधिक फ़िज़ूलखर्च और आम जनता के दुख-दर्द के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील दिखाया गया। अनेक चित्रों में शाही परिवार को अपमानजनक, हास्यास्पद और गरिमाहीन परिस्थितियों में दर्शाया गया। इन चित्रों का उद्देश्य ऐतिहासिक सत्य प्रस्तुत करना नहीं था, बल्कि राजसत्ता के चारों ओर निर्मित दैवीय आभामंडल को तोड़ना और जनता के मन में यह स्थापित करना था कि राजा भी कोई अलौकिक सत्ता नहीं, बल्कि एक साधारण और त्रुटिपूर्ण इंसान है।
इनमें से कई चित्र अतिरंजित थे, कई सनसनीखेज़ थे और कुछ पूरी तरह काल्पनिक भी थे। लेकिन उनका उद्देश्य इतिहास लिखना नहीं, बल्कि जनता के मनोविज्ञान को बदलना था—डर की जगह हँसी पैदा करना, श्रद्धा की जगह तिरस्कार पैदा करना और अंधभक्ति की जगह प्रतिरोध की भावना जगाना।
यह रणनीति सफल भी हुई, क्योंकि सत्ता केवल कानूनों और सेनाओं के बल पर नहीं टिकती; वह लोगों के मन में बनी अपनी छवि के सहारे भी जीवित रहती है। जिस क्षण राजा जनता की नज़रों में ईश्वर का प्रतिनिधि न रहकर उपहास का पात्र बन गया, उसी क्षण निरंकुश राजशाही की मनोवैज्ञानिक नींव दरकने लगी। इतिहास हमें यही सिखाता है कि कोई भी शक्तिशाली सिंहासन गिरने से पहले उसकी अजेयता और पवित्रता का भ्रम टूटना आवश्यक होता है।
उदाहरण के लिए अमेरिका को ही देखिए। डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में लोगों ने बेहद तीखी भाषा, अपमानजनक चित्रों और कड़े व्यंग्य का इस्तेमाल किया। लेकिन मैंने वहाँ यह नहीं देखा कि केवल अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल पर आम नागरिकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमनात्मक अभियान चलाए गए हों या टीवी चैनल केवल इसलिए लोगों की गिरफ्तारी की माँग कर रहे हों कि किसी ने किसी राजनीतिक नेता के लिए गाली का इस्तेमाल किया।
मेरी वास्तविक चिंता गाली-गलौज से तब शुरू होती है जब उसका इस्तेमाल सत्ता में बैठे लोग करते हैं।
स्थिति कहीं अधिक गंभीर तब हो जाती है जब स्वयं सरकारी तंत्र या उसके प्रतिनिधि आम नागरिकों के साथ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करें। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान ऐसी रिपोर्टें और आरोप सामने आए कि कुछ पुरुष पुलिसकर्मियों ने महिला प्रदर्शनकारियों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया और उनके कपड़े फाड़ देने जैसी धमकियाँ दीं। यदि ऐसा हुआ है, तो यह केवल अभद्र भाषा का मामला नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण है, क्योंकि राज्य का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा करना है, उन्हें डराना या अपमानित करना नहीं।
समस्या तब भी गंभीर हो जाती है जब किसी व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक आईटी सेल, मीडिया के कुछ हिस्सों या प्रभावशाली समर्थकों द्वारा संगठित अभियान चलाए जाते हैं। हमने ऐसे कई मामले देखे हैं जहाँ लोगों ने बलात्कार की धमकियाँ, जान से मारने की धमकियाँ और लगातार ऑनलाइन उत्पीड़न झेलने के आरोप लगाए हैं। चाहे आप रिया चक्रवर्ती के साथ मीडिया के व्यवहार को देखें या हालिया रुचिका विवाद को, इस प्रकार के संगठित अभियान किसी आम नागरिक द्वारा विरोध प्रदर्शन के दौरान गुस्से में दी गई एक गाली से कहीं अधिक खतरनाक हैं।
यही बात मुझे सबसे अधिक चिंतित करती है।
बाकी अगर हम खुद से ईमानदारी से सवाल करें, तो सच यही है कि हमने अपने रोज़मर्रा के जीवन में गाली-गलौज को पहले ही सामान्य बना दिया है। यह हमारे घरों में, गलियों में, दोस्तों के बीच और लगभग हर सामाजिक वर्ग में सहज रूप से बोली जाती है। ऐसे में राजनीति के मुद्दे पर अचानक खुद को अत्यंत शिष्टाचारपूर्ण और आदर्श समाज के रूप में प्रस्तुत करना गहरे पाखंड के अलावा कुछ नहीं है।
शब्दों की चुनिंदा नैतिक निगरानी करने के बजाय हमें एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहिए—आख़िर कौन अपनी शक्ति और प्रभाव का इस्तेमाल दूसरों को चुप कराने, डराने या उनका उत्पीड़न करने के लिए कर रहा है?
क्योंकि विरोध प्रदर्शन के दौरान किसी नागरिक द्वारा किसी राजनेता को गुस्से में गाली देना और सत्ता में बैठे लोगों द्वारा अपने अधिकारों का उपयोग—या दूसरों को प्रोत्साहित करके—आम नागरिकों को निशाना बनाना, इन दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
आइए यह दिखावा करना बंद करें कि हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा केवल गाली-गलौज है। असली चिंता का विषय पाखंड और सत्ता का दुरुपयोग होना चाहिए।
